जीवन एक सोच

जीवन एक सोच

ईश्वर ने हर व्यक्ति को इस योग्य बनाया है कि वह चाहे तो अपने आप को परिवर्तित कर सकता है। यह हमारे अपने वश में है कि हम जैसा चाहे वैसा बन सकते हैं, अपने दुःखद जीवन को सुखद बना सकते हैं, समस्याओं को अनुकूल बना सकते हैं । यानि की तुच्छ लगने वाले जीवन को सम्मान योग्य बना सकते हैं ।।
वास्तव मे हमारे शरीर की गतिविधि और चेहरे से जो कुछ भी झलकता है वह  हमारी मानसिक अवस्था को ही प्रतिबिंबित करता है। हमारी खुशी- दुख, संतोष-असंतोष सारी परिस्थितियां हमारे चिंतन और सूझबूझ की उपज होती हैं। अतः यदि हम अपने चिंतन, अपनी मानसिकता को बदल लें तो हमारी परिस्थितियां स्वतः ही अनुकूल हो जाएंगी। यदि हम अपना दृष्टिकोण बदल लें तो हमारा मन मस्तिष्क एवं चरित्र स्वतः ही बदल जायेगा।
       यदि हम अपने प्रतिदिन के वार्तालाप का गंभीरता से विश्लेषण करें तो यह अनुभव होगा कि हम सब  प्रायः नकारात्मक शब्दों का प्रयोग अधिक करते हैं, जो कि निराशाजनक होते हैं। उदाहरण के लिए असंभव, थकान ,दुख ,परेशानी, बीमारी, आदि ऐसे शब्द हैं जिससे मस्तिष्क में भी नकारात्मक ऊर्जा पहुंच ही जाती है। इसके विपरीत यदि हम अच्छा, सुंदर, सुखद, मजबूत, संभव, और हंसी मजाक जैसे सकारात्मक शब्दों का प्रयोग अधिक करते हैं तो एक अलग ही अनुभव का आभास होता है।  तात्पर्य यह है कि सकारात्मक शब्द आशावादी बनाने में हम पर गहन प्रभाव डालते हैं और हम अनजाने में ही नकारात्मक शब्दों को अपने मस्तिष्क में प्रवेश करने की आज्ञा देते रहते हैं। हमारे वार्तालाप में भी प्रायः ऐसे नकारात्मक वाक्य शायद अनजाने में ही शामिल हो जाते हैं जैसे कि
* उसे मुझ पर भरोसा नहीं होगा।
* इस समस्या का शायद ही कोई समाधान हो
* मेरी तो किस्मत ही खराब है। 
* मेरे पास तो बिल्कुल भी समय ही नहीं है।
*ये काम मैं ठीक से कर ही नहीं पता।
    वैसे तो यह साधारण से उदासीनता वाले वाक्य हैं परंतु यह हमारे वार्तालाप को ना केवल बीमार करते हैं बल्कि हमारे अंदर धीरे-धीरे करके एक उदासी के भाव को पोषित कर देते हैं। वैसे तो आशावादी रहने के लिए मुस्कान भी एक अभूतपूर्व नुस्खा है क्योंकि हमेशा मुंह लटकाने से तो कुछ भी प्राप्त होने वाला नहीं है। 
      अच्छी और बुरी परिस्थितियों से  प्रभावित होना तो  मनुष्य का स्वभाव है। एक स्वस्थ चेहरे से खुशी का झलकना और अस्वस्थ चेहरे से उदासी का प्रकट होना भी स्वाभाविक बात ही है पर आजकल अधिकतर चेहरे तो उदास ही दिखाई देते हैं, खुशी की झलक तो कभी कभार ही नजर आती है।  हमारे विचारों का हमारे शरीर से बहुत ही घनिष्ट संबंध होता है जैसे क्रोध की स्थिति में हमारे हृदय की गति तीव्र हो जाती है, भय की दशा में सांस तेज चलने लगती है।
और सुखद विचारों से हमारे शरीर की कार्यप्रणाली सुचारू रूप से क्रियान्वित होती रहती है ।
  इसलिए यदि हम अपने विचारों को उचित दिशा देकर अच्छी आदतों को विस्तृत करना अपना स्वभाव बना ले तो बात बन सकती है।।।
  धन्यवाद ।

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